योग क्या है?

योग एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ है जुड़ना या मिलना या एक होना | इसका यह अर्थ मान ले आत्मा का परमात्मा से मिलान | हमारे ऋषि मुनि मानते है कि परमात्मा तो हर जगह पर है पर उसे पाना इतना आसान नहीं है क्योकि बिच में राक्षीय शक्तियों काम, क्रोध, लोभ, मोह व अहंकार रूकावट डालते है | हम यह जानते है कि परमपिता  परमात्मा के पास अनंत शक्तिया है पर मनुष्य अपने आप को लाचार समझ बैठा है | जब वह हर रोज योग करेगा तो उससे जुड़ेगा व उसकी हर समस्या का हल परमात्मा से ही प्राप्त हो जायेगा | 

क्योकि पंतञ्जलि ऋषि ने भी कहा है

 योगश्चित वृति निरोधा 

चित को बाहरी व्रतियों से हटाना ही योग है 

योग के प्रकार 

१. कर्म योग 

जब मनुष्य किसी कर्म को करते समय अहंकार का त्याग करता है तो वह उस कर्म के करता के अधिकार को त्याग देता है वह सिर्फ कर्म को करने का अपने आप को माध्यम मानता है | व् यह सोचता है के उसके सभी कर्मो को करने वाला परमात्मा है इस तरह वह परमात्मा के निकट हो जाता है व हर समय उस परमाता को कर्म करते समय याद करता है तो उसका हर कर्म धर्म हो जाता है व कर्म के माद्यम से ईश्वर से मेल कर लेता है 

२. भक्ति योग 

जब मनुष्य इस योग को करता है तो वह परमात्मा को अपना गुरु मानता है व हर जिव में उसी परमात्मा को देखता है | वह हर समय उसको याद करता है व उसके प्रेम कीधारा उसके मन में बहती रहती है | यही भक्ति योग है जिस से उसे मुक्ति मिलती है 

३. ज्ञान योग 

जब योगी ज्ञान योग को अपने जीवन का अंग बना लेता है तो हर समय वह ज्ञान प्राप्त करने में मग्न रहता है | व ईश्वर के अद्भुत ज्ञान के सागर को देख कर नत मस्तक होता है | वह अपने आप को इस ज्ञान के सागर की एक बून्दमानता है व परमत्मा को ज्ञान का सागर व अपना एहंकार त्याग कर एक विद्यार्थी की तरह अपने गुरु की चरणों में बैठ कर ज्ञान प्राप्त करता है | 

४. हठ योग 

इसका अर्थ है जबर्दस्ती करना |  मन को बार बार अभ्यास से परमात्मा की तरफ लेकर जाना ही हठ योग है | 

५. अष्टांग योग 

इसमें योग के आठ अंग माने गए है | जिस से परमात्मा से मेल किया जाता है 

  1. यम 

  2. नियम 

  3. आसान 

  1. प्रणवायाम 

  2. प्रत्याहार 

  3. धारणा 

  4. ध्यान 

  5. समाधि 

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